स्वयंसेवकत्व का भाव हम सभी मे प्रबल ऊर्जा के रूप संचारित रहे ऐसे गुणों को आत्मसात करे।
हम सभी स्वयंसेवक बहुत भाग्यशाली है जो हम प्रत्यक्ष अनुभव शाखा की बदौलत कर पाते है, हम जिस संघठन के घटक स्वरूप अपना समर्पण भाव आत्मीयता से देने के लिये प्रयासरत रहते है। यह सब उन श्रेष्ठ जनों के संघ के प्रति समर्पण भाव का ही परिणाम है, उनकी ऊर्जा हमें प्रेरित करती रहती है।
हमारी पूर्ण जिमेदारी है उन सभी वरिष्ठजनों के विशुद्ध प्रेम ,समर्पण, सामाजिक आत्मीयता को धरोहर स्वरूप हम सभी निस्वार्थ भाव से आगे बढ़ानी है। सज्जन शक्ति आत्मीयता से संघ कार्य मे जुड़ती जाए। हम सभी अपने अपने दायित्वों का निर्वहन संघ के प्रति श्रद्धा भाव से निभाते जाए। सब कार्य आसान है।
स्वयंसेवकत्व का भाव हम सभी मे प्रबल ऊर्जा के रूप संचारित रहे ऐसे गुणों को आत्मसात करे।
संघे शक्ति कलियुगे
*पहला गुण-सेवा भाव*
सेवा भाव का होना चाहिये. कार्य तो हर कोई करता है, भोजन करना, स्नान करना आदि सब अपने लोग अपने काम करते है, उन्होंने पूछा, लेकिन क्या ये सब कार्यकर्ता हो गये ? दूसरों के लिये निष्ठापूर्वक स्वयं अपनी सुविधा को छोड़कर भी काम करने की भावना कार्यकर्ता में होनी चाहिये.
*दूसरा गुण-सहिष्णुता*
सहिष्णुता को दूसरा अनिवार्य गुण बताते हुए जैन मुनि ने कहा कि कार्यकर्ता में कठिनाइयों को झेलने की क्षमता होनी चाहिये. एक कार्यशील व्यक्ति के सामने विपरीत परस्थितियां आ सकतीं हैं . कहीं यात्रा में ऊबड़-खाबड़ जमीन पर सोना पड़ सकता है, सादा भोजन भी करना पड़ सकता है . इसी प्रकार, कहीं पर अच्छा भोजन, कहीं सम्मान तो कहीं असम्मान मिल सकता है. कई बार लोग जानकारी न होने के कारण अपनी अवधारणा से अलग बात करने लग जाते हैं . लेकिन कार्यकर्ता को हर स्थिति में शांत रहना चाहिये . गुस्सा करने की वजह हर परिस्थिति को सहन करना ही कार्यकर्ता का धर्म है .
*तीसरा गुण -मैत्री भावना*
कार्यकर्ता में मैत्री भावना को उन्होंने तीसरा गुण बताया. कार्यकर्ता को ज्यादा गुस्सा नहीं करना चाहिये . गुस्सा करना तो हमारी कमजोरी है . हमें कोई गधा कह दे, कुछ भी कह दे लेकिन शांत रहकर उसकी बात सुननी चाहिये . आवेश में आये बिना कार्यकर्ता को अपनी बात कहनी चाहिये . झुकने की जरूरत नहीं लेकिन मौके पर अपनी बात जरूर कह देनी चाहिये .
*चौथा गुण-ईमानदारी*
चौथा सूत्र है कार्यकर्ता में ईमानदारी होनी चाहिये . बात का सच्चा होना चाहिये और पैसे का मामला हो, समाज से चंदा-अनुदान मिलता है, तो उसमें कोई गड़बड़ी न हो जाये, इसके लिये आर्थिक शुचिता होनी चाहिये . समाज ने जो विश्वास के रूप में दिया है तो हम भी समाज के विश्वास की सुरक्षा करें और धन के साथ नैतिक मूल्यों को जोड़े रखें . नैतिकता के साथ धन का ध्यान रखें .
*पांचवा गुण-कार्यकौशल*
पांचवां सूत्र है कार्यकौशल . कार्यकर्ता को अपनी कुशलता का विकास करना चाहिये कि मैं काम कितने बढि़या ढंग और कितने अच्छे ढंग से करूं .
*छठा गुण-विवेक सम्पन्नता*
छठा सूत्र है विवेक सम्पन्नता . कार्यकर्ता विवेकशील हो व अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक हो . कृतघ्न और अनुशासन के बिना यह लोकतन्त्र का देवता भी विनाश और मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा . लोकतन्त्र हो, राजतन्त्र हो या कोई भी तन्त्र हो, निष्ठा सब जगह आवश्यक होती है .
*सांतवा गुण-अनुशाशनबद्धता*
सातवां गुण अनुशासनबद्धता है . अनुशासन कार्यकर्ता के लिये अनिवार्य है.
इस प्रकार, इन सात गुणों के साथ कार्यकर्ता अपने कार्य में सफल हो सकता है .
कार्यकर्ता अपना ऊंचा एवं उदात्त लक्ष्य बनाये रखें .
भारतमाता की जय 💞🕉️ 🚩🙏
SantoshKumar B Pandey at 9.15PM.




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