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Showing posts from October, 2019

#_गृहस्थ_प्रचारक_भैया_जी_दाणी_#

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#_गृहस्थ_प्रचारक_भैया_जी_दाणी_ # आज आपका अवतरण दिवस हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परम्परा में प्रचारक अविवाहित रहकर काम करते हैं; पर कुछ अपवाद भी होते हैं। ऐसे गृहस्थ प्रचारकों की परम्परा के जनक प्रभाकर बलवन्त दाणी का जन्म 9 अक्तूबर, 1907 को उमरेड, नागपुर में हुआ था। आगे चलकर ये भैया जी दाणी के नाम से प्रसिद्ध हुए। ये अत्यन्त सम्पन्न पिता के इकलौते पुत्र थे। उनके पिता श्री बापू जी लोकमान्य तिलक के भक्त थे। अतः घर से ही देशप्रेम के बीज उनके मन में पड़ गये थे, जो आगे चलकर डा. हेडगेवार के सम्पर्क में आकर पल्लवित पुष्पित हुए।  भैया जी ने मैट्रिक तक पढ़ाई नागपुर में की। इसके बाद डा0 हेडगेवार ने उन्हें पढ़ने के लिए काशी भिजवा दिया। वहाँ उन्होंने शाखा की स्थापना की। नागपुर के बाहर किसी अन्य प्रान्त में खुलने वाली यह पहली शाखा थी। इसी शाखा में काशी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी) भी आये, जो डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद सरसंघचालक बने।  काशी से लौटकर भैया जी ने नागपुर में वकालत की पढ़ाई की; पर संघ कार्य तथा घरेलू खेतीबाड़ी की देख...

" राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ "

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संघ ( राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ) :- 1. यह सुनिश्चित है कि किसी भी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थिति में साहस के साथ अपना मार्ग निकालते हुए, सब प्रकार के संकटों को कुचलते हुए तथा उनकी परवाह न करते हुए, संघ अपने विशिष्ट मार्ग से निरन्तर प्रगतिपथ पर अग्रेसर रहेगा। हम पर जितने आघात होंगे उतनी ही अधिक शक्ति से रबर की गेंद के समान उछल कर ऊपर ही उठेंगे। हमारी शक्ति अबाधित रूप से बढ़ती ही जायेगी और एक दिन वह सारे राष्ट्र में व्याप्त हो जायेगी। 2. स्वराज्य-प्राप्ति एक घटना है, क्रिया है। स्वतंत्र समाज-जीवन सुरक्षित और संपन्न रखना चिरंतन महत्व का प्रश्न है। उसके लिये राष्ट्र सदैव सिध्द रहना चाहिए। वह सिध्दता रहने के लिये राष्ट्र-जीवन में से हानिकारक अवगुण मिटाकर सुसूत्र, सामर्थ्यशाली समाज-जीवन निर्माण करने की दृष्टि से अपना कार्य खड़ा किया गया है। हिंदू-राष्ट्र-जीवन की कल्पना निर्भयपूर्वक सामने रखकर उसकी गौरववृध्दि के लिये सारा समाज एकसूत्र में संगठित करने का कार्य अपने सामने है। इसलिये संघ के नाम सहित प्रत्येक बात का सूक्ष्मता से विचार कर कार्य की रचना की गई है। 3. समष्टि-जीवन की भावन...

शाखा मुख्यशिक्षक : व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण !

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शाखा   मुख्यशिक्षक   यह शब्द संघ के स्वयं सेवकों को एकदम से समझ में आयेगा। मेरे जीवन में जितने भी दायित्व रहे उसमें सबसे अच्छा दायित्व मुख्य शिक्षक का ही है । पहले गटनायक बनाया फिर गणशिक्षक फिर नयी जगह शाखा लगाना और पहले बिना ध्वज की शाखा लगाना फिर शाखा को ध्वज मिले इसके लिये लोगो को प्रार्थना याद कराना,गणवेष बनवाना,तीन गण तक बने यह चिंता करना। सच में शाखा का मुख्य शिक्षक बनना मतलब एक साम्राज्य खड़ा करने जैसा । यही संघ हैं जो अपने स्वयंसेवकों को एक साम्राज्य खड़ा करने का अवसर देता हैं।   *स्वयंसेवक* स्वयंसेवक होने से बढ़कर गर्व और सम्मान की दूसरी बात हमारे लिए  कोई   नहीं है। जब हम कहते हैं कि मैं एक साधारण स्वयंसेवक हूँ, तब इस दायित्व का बोध हमें अपने हदय में रखना चाहिए कि यह दायित्व बहुत बड़ा है। समाज भी हमारी ओर देख रहा है और समाज हमें एक स्वयंसेवक के रूप में देखता है। समाज की हमसे बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ रहें और उन अपेक्षाओं को पूर्ण करते हुए हम उनसे भी अधिक अच्छे प्रमाणित हों। शाखा के विषय में नित्य करणीय बातें संघ-शाखा के विषय में ध्यान रखें कि हमारी शा...