परमपूज्यनीय श्री गुरूजी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर : एक नए युग के पथप्रदर्शक ( पायनियर ) !
परमपूज्यनीय श्री गुरूजी ने कहा : सबसे पहला कर्तव्य है जिस देश को अनंतकाल से हमने अपनी पवित्र मातृभूमि माना है, उसके लिये ज्वलन्त भक्ति-भावना का आविर्भाव। द्वितीय है साहचर्य एवं भ्रातृत्व भावना, जिसका जन्म इस अनुभूति के साथ होता है कि हम एक ही महान माता के पुत्र हैं। तृतीय है, राष्ट्र-जीवन की समान धारा की उत्कट चेतना जो समान संस्कृति एवं समान पैतृक दाय, समान इतिहास, समान परम्पराओं, समान आदर्शों एवं आकांक्षाओं से उत्पन्न होती है। जीवन के मूल्यों की यह त्रिगुणात्मक मूर्ति एक शब्द में हिंदू राष्ट्रीयता है जो राष्ट्र-मन्दिर के निर्माण के लिये आधार बनती है। श्रीगुरू जी मातृशक्ति कहते है, वे विवाहित न थे किन्तु विवाह विरोधी न थे वे कहते है कि -- '' हम सबके अन्दर एक ही परमतत्व है विद्यामान है, जो हमें आपस मे जोड़ने का आधार प्रदान करता है, हमारे दर्शन मे उसे आत्मा कहा गया है। हम एक दूसरे के साथ जो प्रेम औरसेवा का व्यवहार करते है वह वाह्य सम्बन्धों पर आधारित नही है।'' याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से यही कहा है - ''ओ मैत्रियि, पत्नी पति से इस लिये प...