स्वयंसेवकत्व का भाव हम सभी मे प्रबल ऊर्जा के रूप संचारित रहे ऐसे गुणों को आत्मसात करे।
हम सभी स्वयंसेवक बहुत भाग्यशाली है जो हम प्रत्यक्ष अनुभव शाखा की बदौलत कर पाते है, हम जिस संघठन के घटक स्वरूप अपना समर्पण भाव आत्मीयता से देने के लिये प्रयासरत रहते है। यह सब उन श्रेष्ठ जनों के संघ के प्रति समर्पण भाव का ही परिणाम है, उनकी ऊर्जा हमें प्रेरित करती रहती है। हमारी पूर्ण जिमेदारी है उन सभी वरिष्ठजनों के विशुद्ध प्रेम ,समर्पण, सामाजिक आत्मीयता को धरोहर स्वरूप हम सभी निस्वार्थ भाव से आगे बढ़ानी है। सज्जन शक्ति आत्मीयता से संघ कार्य मे जुड़ती जाए। हम सभी अपने अपने दायित्वों का निर्वहन संघ के प्रति श्रद्धा भाव से निभाते जाए। सब कार्य आसान है। स्वयंसेवकत्व का भाव हम सभी मे प्रबल ऊर्जा के रूप संचारित रहे ऐसे गुणों को आत्मसात करे। संघे शक्ति कलियुगे *पहला गुण-सेवा भाव* सेवा भाव का होना चाहिये. कार्य तो हर कोई करता है, भोजन करना, स्नान करना आदि सब अपने लोग अपने काम करते है, उन्होंने पूछा, लेकिन क्या ये सब कार्यकर्ता हो गये ? दूसरों के लिये निष्ठापूर्वक स्वयं अपनी सुविधा को छोड़कर भी काम करने की भावना कार्यकर्ता में होनी चाहिये. *दूसरा गुण-सहिष्णुत...