शाखा मुख्यशिक्षक : व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण !

शाखा मुख्यशिक्षक 

यह शब्द संघ के स्वयं सेवकों को एकदम से समझ में आयेगा। मेरे जीवन में जितने भी दायित्व रहे उसमें सबसे अच्छा दायित्व मुख्य शिक्षक का ही है । पहले गटनायक बनाया फिर गणशिक्षक फिर नयी जगह शाखा लगाना और पहले बिना ध्वज की शाखा लगाना फिर शाखा को ध्वज मिले इसके लिये लोगो को प्रार्थना याद कराना,गणवेष बनवाना,तीन गण तक बने यह चिंता करना। सच में शाखा का मुख्य शिक्षक बनना मतलब एक साम्राज्य खड़ा करने जैसा । यही संघ हैं जो अपने स्वयंसेवकों को एक साम्राज्य खड़ा करने का अवसर देता हैं।  

*स्वयंसेवक*

स्वयंसेवक होने से बढ़कर गर्व और सम्मान की दूसरी बात हमारे लिए कोई नहीं है। जब हम कहते हैं कि मैं एक साधारण स्वयंसेवक हूँ, तब इस दायित्व का बोध हमें अपने हदय में रखना चाहिए कि यह दायित्व बहुत बड़ा है। समाज भी हमारी ओर देख रहा है और समाज हमें एक स्वयंसेवक के रूप में देखता है। समाज की हमसे बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ रहें और उन अपेक्षाओं को पूर्ण करते हुए हम उनसे भी अधिक अच्छे प्रमाणित हों।
शाखा के विषय में नित्य करणीय बातें
संघ-शाखा के विषय में ध्यान रखें कि हमारी शाखा निम्नलिखित अपेक्षाओं को पूर्ण करनेवाली हो
* शाखा नित्य लगनी चाहिए।
* वह निश्‍चित समय पर लगनी चाहिए।
* शाखा में भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यक्रम होने चाहिए।
* सब स्वयंसेवकों में परस्पर मेलजोल, स्नेह, प्रेम और शुद्धता का वातावरण हो।
* आपस में विचार-विनिमय, चर्चा आदि कर अपने अंत:करण में ध्येय  साक्षात्कार नित्य अधिकाधिक सुस्पष्ट और बलवान करते रहने की हमारे अंदर प्रेरणा व इच्छा रहे।
* सामूहिक रूप से नित्य अपनी प्रार्थना का उच्चारण गंभीरता, श्रद्धा तथा उसका भाव समझकर करें।
* हमारे परम पवित्र प्रतीक के रूप में जो अपना भगवा ध्वज है, उसे मिलकर नम्रतापूर्वक प्रणाम करें।
* ‘‘शाखा विकिर’ के अनंतर बैठकर आपस में बातचीत करें। कौन आया, कौन नहीं आया, इसकी पूछताछ करें।
ऐसी अपनी दैनिक शाखा के विषय में नित्य करणीय बातें हैं।

नित्य न्यूनतम कार्य
* यदि शाखा नियमित एवं समय पर प्रारंभ करनी है तो शाखा के निर्धारित समय से पर्याप्त पूर्व अपने निवास से निकलें और शाखा के समय से कम से कम दो मिनट पूर्व संघस्थान पर उपस्थित रहें।
*कोई हमें बुलाने आएगा तब जाएँगे, ऐसी प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं है। बुलाने वाला अपना कर्तव्य करेगा, पर उसे कर्तव्य करने का अवसर देने के लिए घर पर ही बैठे रहें, यह उचित नहीं, इसका ध्यान रखें।
* विचार करें कि मैं संगठन करनेवाला मनुष्य हूँ, अकेलाराम नहीं। तब शाखा के लिए कुछ पहले निकलकर आसपास जो स्वयंसेवक रहते हों, उन्हें पुकारकर अपने साथ ले जाएँ। इसमें दायित्व का प्रश्‍न नहीं उठता। गटनायक अथवा गणशिक्षक बनने पर ही करने का काम नहीं है। सामान्य बात है कि जब भी हम किसी अच्छे काम के लिए जाते हैं, तो अपने साथ अपने मित्रों को बुलाकर ले जाते हैं। यह हमारे लिये स्वाभाविक कार्य होना चाहिए।
* संघस्थान पर सभी कार्यक्रम मन लगाकर, अनुशासनपूर्वक, नियमानुसार करें। उसमें कष्ट हो तो रुष्ट न हों। अपने कार्यक्रम कष्टकर होते हैं। कष्ट करने का अभ्यास कर बड़े-बड़े काम सहज करने की शक्ति बढ़ानी चाहिए। इसलिए उन्हें प्रयत्नपूर्वक करें। ये कार्यक्रम अंत:करण में निर्भयता, आत्मविश्‍वास, पराक्रम के भाव उत्पन्न कर सबको एक अनुशासन में गूँथकर, हम सब एक महती शक्ति के अंग हैं, इस अनुभूति को निरंतर जागृत रखने के लिए हैं। इसलिए उन कार्यक्रमों का उत्तम अभ्यास करें।
* विकिर होने पर तुरत-फुरत घर भागने की इच्छा नहीं होनी चाहिए। घर जाने अथवा और कहीं घूमने जाने की इच्छा होने का अभिप्राय होगा कि हम शाखा में अनिच्छा से बलात् आए थे। विकिर होते ही इस बला से मुक्त होने का अनुभव करते हैं। हम किसी के दबाव में शाखा नहीं आते। आना भी नहीं चाहिए। अत: बैठकर दो काम करें
        पहला यह कि शाखा में आनेवाले स्वयंसेवक बंधुओं में से कौन आए, कौन नहीं आए, इसकी जानकारी कर लें और जो नहीं आया हो, उसकी चिंता करें। वे क्यों नहीं आए इसका पता लगाने छोटी-छोटी टोलियों में सबके यहाँ जाएँ।कोई कठिनाई हो तो उसका निवारण करने का प्रयास करें। कठिनाई न हो, तो अकारण शाखा से अनुपस्थित रहना ठीक नहीं यह बात उसे भली-भाँति समझाएँ।
      दूसरा यह कि नित्य अपने ध्येय का स्मरण करें। हिमालय से लेकर दक्षिणी महासागर के तट तक असंख्य पवित्र स्थान बिखरे हैं, उनका स्मरण करें। अनेक ऐतिहासिक स्थल हैं, प्रत्येक स्थल से किसी महापराक्रमी पुरुष की कुछ न कुछ विशेषता जुड़ी हुई है, उसका स्मरण करें। उस महापुरुष की विशेषता में से जो गुण प्रकट होते हैं, उनका सब मिलकर स्मरण करें और उन्हें अपने में उतारने के प्रयास का निश्‍चय करें।
यह है हमारा नित्य का न्यूनतम कार्य। ‘‘साधारण स्वयंसेवक’ के रूप में इतना हमें करना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त भी हमारे लिए कुछ कर्तव्य हैं।

दैनिक संघ की शाखा में निजी स्वार्थ ,हित , भेदभाव , जाति-पाति आदि सामाजिक विकार को भूलाकर लोग आते हैं। इसमें केवल एक दूसरे स्वयंसेवक को केवल नाम व काम के आधार पर जाना जाता है , जात – पात के आधार पर नहीं। किसी दूसरे स्वयंसेवक को यह पता भी नहीं होता कि दूसरा स्वयंसेवक किस जाति से है , ‘ सभी हिंदू हैं ‘ , ‘ हिंदू भाई हैं ‘ इस भावना से सभी को राष्ट्रहित में एक-दूसरे को गले लगाते हैं। 

संघ की शाखा में अथवा उसके क्रियाकलापों से स्वयंसेवक में क्या-क्या गुण आते हैं अथवा शाखा क्यों आवश्यक है ,एक नजर में –

१ संघ की शाखा से  नेतृत्व करने की क्षमता का विकास होता है।

२ संघ की शाखा के कारण  शारीरिक , मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है।

३ संघ की शाखा से  समाज में तारतम्यता स्थापित करने की क्षमता का विकास होता  है।

४ संघ की शाखा से  जाति-पाति से परे विचार करने की क्षमता का विकास करता  है। 

५ संघ की शाखा से  सामाजिक कल्याण के विषय में सोचने की प्रवृत्ति आती है।

६ संघ की शाखा से पूरे भारतवर्ष को अपना परिवार व विश्व – बंधुत्व की भावना को अपनाने का भाव आता है।

७ स्वयंसेवक किसी भी प्रकार के भय से भयभीत नहीं होता। 

८ स्वयंसेवक  विकट परिस्थितियों में भी धैर्य व साहस से कार्य करता है।

९ स्वयंसेवक छोटे – बड़े को समान आदर करने की भावना का विकास होता है

१० स्वयंसेवक  किसी भी स्वयंसेवक का सुख – दुख अपना सुख व दुख मानने लगता है। 


राष्ट्रवाद का साम्राज्य यूँ ही चलते फिरते खड़ा नही हो जाता हैं। लाखों बलिदान होते हैं तब एक राष्ट्र खड़ा होता हैं। 
भारत माता की जय
 🙏🌹🕉🌹🚩🌹🙏



Santoshkumar B Pandey at 4.45PM.

Comments

Devesh said…
भाईसाहब नमस्कार!!
मै बीकानेर, राजस्थान से एक स्वयंसेवक हूँ । आज ही आपका ब्लाॅग देखा । बहुत ही बढ़िया कार्य आप द्वारा किया जा रहा है । इसे आगे बढाते रहे ।
धन्यवाद
Unknown said…
Sangh Shakti Yuge Yuge

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