प्.पू. डॉक्टर हेडगेवार जी का अन्तिम उद्बोधन !
प्.पू. डॉक्टर हेडगेवार जी का अन्तिम उद्बोधन !
बहुत सावधानी से, 9 जून 1940 को डाक्टरजी को संघ-शिक्षा-वर्ग में लाया गया। उस वर्ष, वहां पर सब प्रान्तों का प्रतिनिधित्व था बंगाल, बिहार, तमिलनाडु, आन्ध्र, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र आदि सब प्रान्तों के स्वयंसेवक वहां उपस्थित थे। मानो सम्पूर्ण भारतवर्ष छोटा-सा रूप लेकर वहां उपस्थित हुआ था।
उनके द्वारा स्वयंसेवको को दिए गए उद्बोधन के कुछ बिंदु यहा पाठको के लिए प्रस्तुत हे।
“माननीय सर्वाधिकारीजी, प्रांत संघचालकजी, अन्य अधिकारीगण तथा मेरे प्रिय स्वयंसेवक बधुओं!’’
“मुझे इस बात की शंका है कि मेरा स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण मैं आप लोगों के सम्मुख दो-चार शब्द भी ठीक से बोल पाऊंगा या नहीं? गत चौबीस दिनों से मैंने बिलकुल बिस्तर पकड लिया है। सच कहो तो संघकार्य की दृष्टि से यह वर्ष बडे भाग्य का है। क्योंकि इस वर्ष के अपने इस वर्ग में मैं अपने सामने मानों सम्पूर्ण हिन्दू-राष्ट्र की छोटीसी प्रतिमा ही देख रहा हूं।’’
“आप सब स्वयंसेवक कितनी दूर-दूर से यहां आये हो, परन्तु मेरी बीमारी के कारण मैं आप लोगों से मिल न सका। मेरे मन में बहुत इच्छा थी। परन्तु मैं आप लोगों का प्रत्यक्ष परिचय न प्राप्त कर सका। पूना के संघ -शिक्षा-वर्ग में मैं पंद्रह दिनों तक उपस्थित था। वहां आये हुए सब स्वयंसेवकों से मेने समुचित ढंग से परिचय प्राप्त किया। परन्तु यहां पर मैं आप लोगों की कुछ भी सेवा न कर सका। ठीक है। वह नहीं हो पाया। नहीं सही। अब आप सब लोगों को एकत्रित बैठे हुए कम से कम देख लूं, हो सके तो चार बातें भी कहूं, इस दृष्टि से मैं आज यहां आया हूं।’’
“आप सब लोगों का मुझसे कुछ पुराना परिचय तो है नहीं। यहां कितने ही ऐसे हैं, जिन्होंने न कभी मुझे देखा है, न मैंने उन्हें देखा है। ऐसा होते हुए भी क्यों मेरा मन आपकी ओर दौड रहा है? क्यों आपका मन मेरी ओर खींच रहा है? इसका कारण है यह अपना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। *संघ की विचारधारा का ऐसा ही अद्भुत प्रभाव है। जहां संघ के तत्वों को अपनाया, वहां अपरिचित भी एक-दूसरे की ओर आकर्षित हो जाते हैं और आपस में प्रेम करने लगते हैं। अल्पकाल में उनमें प्रगाढ मित्रता भी उत्पन्न हो जाती है।*’’
“आज आप लोग अपने-अपने स्थानों पर वापिस जा रहे हैं। अतः आपको बिदा करने के लिए मैं यहां आया हूं। यद्यपि हम यहां से दूर चले जावेंगे और बिछुडेंगे, फिर भी यह कोई दुख का अवसर नहीं है। यहां पर एक स्थान पर जुट कर हमने एक महान कार्य का निश्चिय कर लिया है। उसकी पूर्ति के लिए अब हम लोग जा रहे हैं। *प्रतिज्ञा कीजिये कि, जब तक शरीर में प्राण हैं तब तक मैं संघ को नहीं भूलूंगा। किसी भी मोह का शिकार बनकर अपना मार्ग मत छोडिये।* ऐसा कहने की बारी कभी न आने दिजिये कि पांच वर्ष के पूर्व में संघ का स्वयंसेवक था। *हम लोग आजन्म स्वयंसेवक हैं। तन-मन-धन से संघकार्य करने का हमारा निश्चय अपने हृदय में हमें सतत् जागृत रखना चाहिए। ‘आज मैने संघ का क्या कार्य किया?’ ऐसा प्रश्न प्रतिदिन सोते समय हमें अपने मन से पूछना चाहिए। हम यह नित्य ध्यान में रखें कि केवल शाखा के कार्यक्रम नियमित करने से अथवा प्रतिदिन संघस्थान पर उपस्थित रहने से ही संघ का कार्य पूर्ण रूप से नहीं हो जाता है।* हिमाचल से लेकर कन्याकुमारी तक फैले हुए अपने सब हिन्दू भाइयों को हमें संगठित करना है। अपना महत्वपूर्ण कार्य तो संघ के बाहर ही है। *संघ केवल स्वयंसेवकों के लिए नहीं है। संघ के बाहर के लोगों को देश की उन्नति का सच्चा मार्ग दिखाना यह हमारा ही कर्तव्य है। हिन्दू जाति की वास्तविक भलाई हमारे इस संगठन के द्वारा ही होगी।*’’
“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अन्य कोई भी कार्य नहीं है। अनेक लोग पूछते हैं, आगे चलकर संघ क्या करेगा? यह प्रश्न निरर्थक है, *हिन्दू समाज को सुसंगठित बनाने का अपना कार्य ही अधिक तेज गति से संघ आगे भी करता रहेगा। हमारे इस कार्य को करते रहते ही स्वर्णिम दिवस का उदय होगा। यह आप निश्चित समझें। जिस दिन सम्पूर्ण भारत संघमय बना होगा तब फिर हिन्दू समाज की ओर टेढी नजर से देखने की किसी की भी हिम्मत नहीं होगी। हमें किसी पर भी आक्रमण नहीं करना है। परन्तु साथ ही हम पर कोई आक्रमण न करें, इसकी चिन्ता तो हमें करनी ही होगी।*’’
“बस इतना ही कहता हूं कि *हम सब स्वयंसेवकों को यह मानना चाहिए कि संघकार्य को मेरे जीवन में प्रधान स्थान रहेगा; संघकार्य ही मेरा जीवनकार्य होगा।* मुझे दृढ विश्वास है कि यहां से अपने-अपने स्थानों पर जाते समय आप लोग इस मंत्र को अवश्य ही अपने हृदयपर अंकित कर लेंगे। इसी धारणा से मैं आप सब बन्धुओं को बिदाई दे रहा हूं।’’
बोलते-बोलते भाषण के मध्य में दो मिनटों के लिए डॉक्टर जी एकदम मौन हो गये थे। कदाचित् वे थक गये थे। कदाचित् वे भावगद्गद् हो गये थे। कदाचित् भविष्य का स्वर्णिम काल उनकी आंखों के सम्मुख चित्रित हो रहा था। दो मिनट तक वे आंखें मूंद कर चुपचाप बैठ रहे। सामने बैठे हुए स्वयंसेवक भी चुपचाप थे। एकटक डाक्टरजी की ओर देख रहे थे। ऐसा लग रहा था, जैसे सबकी सांस भी अवरुद्ध हो गयी हो। अनेकों के शरीर रोमांचित हो गये थे। अनेकों की आंखों से आंसू झर रहे थे। अनेकों के हृदयों में नये तेज का संचार हो रहा था। डॉक्टर जी का वह मौन एक बडा व्याख्यान ही था।
Santoshkumar B Pandey at 12.31Pm.
Santoshkumar B Pandey at 12.31Pm.


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