प्रचारक : समाज की संघ को देन
प्रचारक : समाज की संघ को देन
श्री शिवराय तेलंग महाराष्ट्र प्रान्त के ज्येष्ठ प्रचारक हैं। 1942 में बड़ी संख्या में संघ प्रचारक निकले, 1943 में
शिवराय जी प्रचारक बने। प.पू.श्रीगुरुजी के निकट सहवास का सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ है। 1948 के संघ बंदी के कालखंड के बाद जिन कार्यकर्ताओं के भरोसे तथा कठोर परिश्रम के आधार पर प.पू. श्री गुरुजी ने संघ को पुनर्जन्म दिया, उनमें बाबाराव भिड़े, वसंतराव भिड़े,गोपाल राव देशपांडे, नाना पालकर,केशवराव केलकर, भैयाराव गौतम,दामुअण्णा दाते, प्रल्हादजी अभ्यंकर,नाना ढोलके तथा शिवराय तेलंग प्रमुख थे।
यहां प्रस्तुत है एक आजीवन प्रचारक का "प्रचारक' संज्ञा के बारे में विवेचन-अतिरिक्त उपयोग से शब्द अपना वास्तविक अर्थ खो बैठते हैं। जैसे आज सामाजिक क्रांति, दलित उद्धार,समर्पित जीवन, समाज के सबसे आखिरी व्यक्ति पर नि:स्वार्थ प्रेम आदि शब्द अपना स्वाभाविक अर्थ खो बैठे हैं, केवल भाषा के अलंकार बन चुके हैं। उसी तरह डा. हेडगेवार के समय त्याग, बलिदान,देशभक्ति आदि शब्दों का अवमूल्यन हो गया था।
अर्थ Options हीन शब्दों को पुन:प्राणवान्, जाग्रत, अर्थपूर्ण करने का कार्य महापुरुष करते हैं। अत्यंत कठिन आर्थिक स्थिति में, कष्टपूर्वक अपनी डाक्टरी का अभ्यास क्रम पूरा करने वाले डा. हेडगेवार ने व्यवसाय किया ही नहीं।
उन्होंने रा.स्व.संघ का निर्माण किया और समाज में परिवर्तन लाने के लिए तीन शब्द इस समाज को दिए।
हिन्दूराष्ट्र, स्वयंसेवक तथा संगठन। इन तीन शब्दों को अर्थवान,प्राणवान, मंत्रमय बनाने हेतु डा.हेडगेवार ने मानो अति-उग्र तपस्या की। अपने भीमकाय, वज्रसमान शरीर को आखिरी क्षण तक कार्यमग्न रखा।बहुआयामी प्रचंड क्षमता को केवल एक ही कार्य में केन्द्रित किया। परम्परागत क्रोधी स्वभाव को प्रयत्नपूर्वक शांत, संयमित कर विशाल लोकसंग्रह किया।
इस विजयदशमी को संघ अपने अमृत महोत्सवी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। पू.डाक्टर जी के द्वारा प्रस्थापित
किए गए वह तीन शब्द आज समाज की सारी समस्याएं सुलझाने के लिए पूर्णत:सिद्ध हो रहे हैं। जब सारा समाज संघ के समकक्ष बनकर खड़ा रहेगा, तब इन तीन शब्दों का कार्य पूर्ण होगा। संघ अपनी शतायु के लिए कदापि उत्सुक नहीं, पर बावनवी सदी में समूचा समाज संघ के समकक्ष बनकर खड़ा हो। यह दृश्य देखने के लिए स्वयंसेवकों को जरूर उत्सुक होना चाहिए।
संघ को स्वयंसेवक का निर्माण करना है;केवल शाखा पर नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में। किसानों में-जवानों में-शिक्षकों में साहित्यकारों में, धर्माचार्यों में-वैज्ञानिकों में, राजकीय पार्टियों में व नेताओं में। इस विशाल कार्य के दायरे में महिलाएं, अभिनेता,मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, सज्जन, दुर्जन सारे लोग समाते है। संघ का स्वयंसेवक जहां कहीं भी जाता है, उसकी नम्रता में सामने वाले व्यक्ति को अहंकार छोड़कर अपने जैसा बनने का आह्वान रहता है।
संघ में अर्थात् संघ शाखा में प्रवेश करने वाला बाल हो, तरुण हो, प्रौढ़ हो अथवा वृद्ध, उसे स्वयंसेवक ही कहते है।स्वयंसेवक बनने के लिए शुल्क, फीस नहीं लगती। शाखा में आया तो स्वयंसेवक बन गया। वास्तव में स्वयंसेवक बनने की प्रक्रिया यहां से शुरू हो गई पर स्वयंसेवक बनना इतना आसान नहीं है।
अपना "अहं' भुलना एक तपस्या है। शाखा पर आने के बाद धीरे-धीरे उस पर छोटी-छोटी जिम्मेदारियां सौंपी जाने लगती हैं।
उसे उन्हें गटनायक बताया जाता है।यानी उस स्वयंसेवक से गटनायक बनने का प्रयास करना, गटनायक के आवश्यक गुण आत्मसात करना अपेक्षित होता है।
ऐसी जिम्मेदारियों में ही एक फायदान है- प्रचारक। एक प्रौढ़ संघचालक अपना अनुभव बताते हैं-वे पन्द्रह
दिन के लिए विस्तारक निकले। पहले ही दिन सुबह उनके सामने सवाल खड़ा हो गया कि अब इन पन्द्रह दिनों का क्या करूं? जब वे संघचालक थे तब उनका कार्यक्रम कोई और तय करता था। कार्यक्रम ठीक तरह हो इसलिए कोई और कार्यकर्ता सहायक रहता था? पर अब? अब कोई सहायक नहीं। मेरा कार्यक्रम मुझे ही निश्चित करना है। वैसे इस गांव के सारे लोग मुझे एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जानते है। खानपान और निवास की व्यवस्था
कहीं भी आसानी से हो सकती है। पर सुबह-शाम-दोपहर खानपान और निवास की व्यवस्था कहीं भी आसानी से हो सकती है। पर सुबह-शाम-दोपहर मैं संघ का कार्य क्या करूं? प्रचारक निकलने के बाद क्या करना है, यह समझने के लिए यह एकउ दाहरण पर्याप्त है। जिस क्षेत्र में हमें प्रचारक बनाकर भेजा जाता है, वहां का समाज जैसा है वैसा ही स्वीकारना होता है। उसके साथ हमें रहना है तो अपना व्यक्तित्व उसके अनुकूल बनाना पड़ता है, तथा इसी के साथ अपने व्यवहार से उस समाज को हिन्दुराष्ट्र और हिन्दू संगठन की अनुभूति मिलती रहे, इस प्रकार से अपना बर्ताव रकना पड़ता है।
संघ कार्य के इतिहास में 1950 से 1970 तक का समय एक ऐसा कालखंड था, जिसमें संघ कार्य को टिकाना तथा उसको बढ़ावा देने की सारी जिम्मेदारी प्रचारकों पर ही आ पड़ी थी। 1948 में गांधीजी हत्या संघ पर लगी पांबदी, बीस-पच्चीस वर्ष की आयु के प्रचारक उसी आयु के शाखा-उपशाखाओं की जिम्मेदारी संभालने वाले असंख्य कार्यकर्ता; संघ कार्य के साथ-साथ उनपर आ पड़ी पारिवारिक आर्थिक जिम्मेदारी- इन विपरीत
परिस्थितियों का सामना करते हुए प्राप्त हुई मानसिक अस्वस्थता; ऐसे दौर से गुजरते-गुजरते संघ कार्य इन बीस वर्षों में बढ़ा, स्थिर हुआ तथा 1970 के बाद से लगातार प्रगति पथ पर अग्रसर रहा। इस कालखंड में संघ कार्य अखंडित रखने की जिम्मेदारी अनिवार्यत:तत्कालीन प्रचारकों को सम्हालनी पड़ी। मेरे विचार से यह एक कठिन दौर था।
संघ और समाज को अगर समकक्ष खड़ा होने है,
करना है तो सर्वदूर असंख्य कार्यकर्ताओं को तैयार करने की आवश्यकता है। हमारा समाज हिन्दू समाज है।
किसी को मान्य हो या अमान्य हो; समाज की सेवा के लिए घरबार छोड़कर निकलना, यह हमारे समाज की प्राचीन काल से चलती आई परम्परा है। सब छोड़कर निकलने वाले यह कार्यकर्ता संन्यासी ही होंगे, ऐसा
भी कोई नियम नहीं। इनमें राजा रन्तिदेव भी हो सकते हैं और दरिद्र नारायण गाडगे महाराज भी हो सकते हैं। स्वामी विवेकानंद और उनके उच्च शिक्षित तरुण संन्यासियों की टोली भी हो सकती है या महिला
शिक्षण तथा महिला पुनर्वसिन कार्य में जीवन न्योछावर कर देने वाले अण्णा साहेब कर्वें भी हो सकते हैं।
अर्था त्जिन्हें हम "प्रचारक' कहेंगे ऐसे व्यक्तियों
का मानो एक प्रवाह प्राचीन काल से इस देश में अक्षुण्ण बहता आया है। और इसलिए मैं कहता हूं कि प्रचारक हिन्दू समाज की संघ को देन है; तथा स्वयंसेवक-यह संघ की हिन्दू समाज को देन है।
महाराष्ट्र प्रान्त में संघ का काम सबसे पहले शुरु हुआ, इसलिए यहां प्रचारकों की संख्या भी अधिक है।
1942 में स्व.बाबासाहब भिडे महाराष्ट्र प्रान्त के प्रमुख प्रचारक थे। वे गृहस्थ थे, वकालत करते थे। उन्होंने महाराष्ट्र प्रान्त के प्रचारकों को "प्रान्त स्वयंसेवक' की
संज्ञा दी थी। प्रान्त स्वयंसेवक कहीं भी गया तो वह कोई गटनायक नहीं,शिक्षक नहीं, कार्यवाह अधिकारी
कुछ भी नहीं, वह तो सारे प्रान्त का है-इसलिए वह है प्रान्त स्वयंसेवक। उस समय स्व. बाबाराव ने किस तर्क का आधार लेकर यह संज्ञा निर्माण की थी, पता नहीं। पर प्रचारक संज्ञा का भावार्थ समझने के लिए मुझे यह संज्ञा अत्यंत सुयोग्य लगती है।
प्रचारक चाहे कश्मीर जाय या कन्याकुमारी, सोमनाथ जाए या जगनन्नाथ; जहां उसकी नियुक्ति की गई है ,
वही उसका गांव है, वहां के लोग उसके अपने लोग हैं। यहीं स्वयंसेवकत्व की सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता है।
यह प्राप्त करने,सीखने, अनुभव करने हेतू ही उसे प्रचारक बनना होता है। ऐसा स्वयंसेवक समाज के
हर क्षेत्र में पहुंचना, यह भारत के पुनरुस्थान का सूत्रपात है।
Santoshkumar B Pandey at 7.31pm
श्री शिवराय तेलंग महाराष्ट्र प्रान्त के ज्येष्ठ प्रचारक हैं। 1942 में बड़ी संख्या में संघ प्रचारक निकले, 1943 में
शिवराय जी प्रचारक बने। प.पू.श्रीगुरुजी के निकट सहवास का सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ है। 1948 के संघ बंदी के कालखंड के बाद जिन कार्यकर्ताओं के भरोसे तथा कठोर परिश्रम के आधार पर प.पू. श्री गुरुजी ने संघ को पुनर्जन्म दिया, उनमें बाबाराव भिड़े, वसंतराव भिड़े,गोपाल राव देशपांडे, नाना पालकर,केशवराव केलकर, भैयाराव गौतम,दामुअण्णा दाते, प्रल्हादजी अभ्यंकर,नाना ढोलके तथा शिवराय तेलंग प्रमुख थे।
यहां प्रस्तुत है एक आजीवन प्रचारक का "प्रचारक' संज्ञा के बारे में विवेचन-अतिरिक्त उपयोग से शब्द अपना वास्तविक अर्थ खो बैठते हैं। जैसे आज सामाजिक क्रांति, दलित उद्धार,समर्पित जीवन, समाज के सबसे आखिरी व्यक्ति पर नि:स्वार्थ प्रेम आदि शब्द अपना स्वाभाविक अर्थ खो बैठे हैं, केवल भाषा के अलंकार बन चुके हैं। उसी तरह डा. हेडगेवार के समय त्याग, बलिदान,देशभक्ति आदि शब्दों का अवमूल्यन हो गया था।
अर्थ Options हीन शब्दों को पुन:प्राणवान्, जाग्रत, अर्थपूर्ण करने का कार्य महापुरुष करते हैं। अत्यंत कठिन आर्थिक स्थिति में, कष्टपूर्वक अपनी डाक्टरी का अभ्यास क्रम पूरा करने वाले डा. हेडगेवार ने व्यवसाय किया ही नहीं।
उन्होंने रा.स्व.संघ का निर्माण किया और समाज में परिवर्तन लाने के लिए तीन शब्द इस समाज को दिए।
हिन्दूराष्ट्र, स्वयंसेवक तथा संगठन। इन तीन शब्दों को अर्थवान,प्राणवान, मंत्रमय बनाने हेतु डा.हेडगेवार ने मानो अति-उग्र तपस्या की। अपने भीमकाय, वज्रसमान शरीर को आखिरी क्षण तक कार्यमग्न रखा।बहुआयामी प्रचंड क्षमता को केवल एक ही कार्य में केन्द्रित किया। परम्परागत क्रोधी स्वभाव को प्रयत्नपूर्वक शांत, संयमित कर विशाल लोकसंग्रह किया।
इस विजयदशमी को संघ अपने अमृत महोत्सवी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। पू.डाक्टर जी के द्वारा प्रस्थापित
किए गए वह तीन शब्द आज समाज की सारी समस्याएं सुलझाने के लिए पूर्णत:सिद्ध हो रहे हैं। जब सारा समाज संघ के समकक्ष बनकर खड़ा रहेगा, तब इन तीन शब्दों का कार्य पूर्ण होगा। संघ अपनी शतायु के लिए कदापि उत्सुक नहीं, पर बावनवी सदी में समूचा समाज संघ के समकक्ष बनकर खड़ा हो। यह दृश्य देखने के लिए स्वयंसेवकों को जरूर उत्सुक होना चाहिए।
संघ को स्वयंसेवक का निर्माण करना है;केवल शाखा पर नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में। किसानों में-जवानों में-शिक्षकों में साहित्यकारों में, धर्माचार्यों में-वैज्ञानिकों में, राजकीय पार्टियों में व नेताओं में। इस विशाल कार्य के दायरे में महिलाएं, अभिनेता,मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, सज्जन, दुर्जन सारे लोग समाते है। संघ का स्वयंसेवक जहां कहीं भी जाता है, उसकी नम्रता में सामने वाले व्यक्ति को अहंकार छोड़कर अपने जैसा बनने का आह्वान रहता है।
संघ में अर्थात् संघ शाखा में प्रवेश करने वाला बाल हो, तरुण हो, प्रौढ़ हो अथवा वृद्ध, उसे स्वयंसेवक ही कहते है।स्वयंसेवक बनने के लिए शुल्क, फीस नहीं लगती। शाखा में आया तो स्वयंसेवक बन गया। वास्तव में स्वयंसेवक बनने की प्रक्रिया यहां से शुरू हो गई पर स्वयंसेवक बनना इतना आसान नहीं है।
अपना "अहं' भुलना एक तपस्या है। शाखा पर आने के बाद धीरे-धीरे उस पर छोटी-छोटी जिम्मेदारियां सौंपी जाने लगती हैं।
उसे उन्हें गटनायक बताया जाता है।यानी उस स्वयंसेवक से गटनायक बनने का प्रयास करना, गटनायक के आवश्यक गुण आत्मसात करना अपेक्षित होता है।
ऐसी जिम्मेदारियों में ही एक फायदान है- प्रचारक। एक प्रौढ़ संघचालक अपना अनुभव बताते हैं-वे पन्द्रह
दिन के लिए विस्तारक निकले। पहले ही दिन सुबह उनके सामने सवाल खड़ा हो गया कि अब इन पन्द्रह दिनों का क्या करूं? जब वे संघचालक थे तब उनका कार्यक्रम कोई और तय करता था। कार्यक्रम ठीक तरह हो इसलिए कोई और कार्यकर्ता सहायक रहता था? पर अब? अब कोई सहायक नहीं। मेरा कार्यक्रम मुझे ही निश्चित करना है। वैसे इस गांव के सारे लोग मुझे एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जानते है। खानपान और निवास की व्यवस्था
कहीं भी आसानी से हो सकती है। पर सुबह-शाम-दोपहर खानपान और निवास की व्यवस्था कहीं भी आसानी से हो सकती है। पर सुबह-शाम-दोपहर मैं संघ का कार्य क्या करूं? प्रचारक निकलने के बाद क्या करना है, यह समझने के लिए यह एकउ दाहरण पर्याप्त है। जिस क्षेत्र में हमें प्रचारक बनाकर भेजा जाता है, वहां का समाज जैसा है वैसा ही स्वीकारना होता है। उसके साथ हमें रहना है तो अपना व्यक्तित्व उसके अनुकूल बनाना पड़ता है, तथा इसी के साथ अपने व्यवहार से उस समाज को हिन्दुराष्ट्र और हिन्दू संगठन की अनुभूति मिलती रहे, इस प्रकार से अपना बर्ताव रकना पड़ता है।
संघ कार्य के इतिहास में 1950 से 1970 तक का समय एक ऐसा कालखंड था, जिसमें संघ कार्य को टिकाना तथा उसको बढ़ावा देने की सारी जिम्मेदारी प्रचारकों पर ही आ पड़ी थी। 1948 में गांधीजी हत्या संघ पर लगी पांबदी, बीस-पच्चीस वर्ष की आयु के प्रचारक उसी आयु के शाखा-उपशाखाओं की जिम्मेदारी संभालने वाले असंख्य कार्यकर्ता; संघ कार्य के साथ-साथ उनपर आ पड़ी पारिवारिक आर्थिक जिम्मेदारी- इन विपरीत
परिस्थितियों का सामना करते हुए प्राप्त हुई मानसिक अस्वस्थता; ऐसे दौर से गुजरते-गुजरते संघ कार्य इन बीस वर्षों में बढ़ा, स्थिर हुआ तथा 1970 के बाद से लगातार प्रगति पथ पर अग्रसर रहा। इस कालखंड में संघ कार्य अखंडित रखने की जिम्मेदारी अनिवार्यत:तत्कालीन प्रचारकों को सम्हालनी पड़ी। मेरे विचार से यह एक कठिन दौर था।
संघ और समाज को अगर समकक्ष खड़ा होने है,
करना है तो सर्वदूर असंख्य कार्यकर्ताओं को तैयार करने की आवश्यकता है। हमारा समाज हिन्दू समाज है।
किसी को मान्य हो या अमान्य हो; समाज की सेवा के लिए घरबार छोड़कर निकलना, यह हमारे समाज की प्राचीन काल से चलती आई परम्परा है। सब छोड़कर निकलने वाले यह कार्यकर्ता संन्यासी ही होंगे, ऐसा
भी कोई नियम नहीं। इनमें राजा रन्तिदेव भी हो सकते हैं और दरिद्र नारायण गाडगे महाराज भी हो सकते हैं। स्वामी विवेकानंद और उनके उच्च शिक्षित तरुण संन्यासियों की टोली भी हो सकती है या महिला
शिक्षण तथा महिला पुनर्वसिन कार्य में जीवन न्योछावर कर देने वाले अण्णा साहेब कर्वें भी हो सकते हैं।
अर्था त्जिन्हें हम "प्रचारक' कहेंगे ऐसे व्यक्तियों
का मानो एक प्रवाह प्राचीन काल से इस देश में अक्षुण्ण बहता आया है। और इसलिए मैं कहता हूं कि प्रचारक हिन्दू समाज की संघ को देन है; तथा स्वयंसेवक-यह संघ की हिन्दू समाज को देन है।
महाराष्ट्र प्रान्त में संघ का काम सबसे पहले शुरु हुआ, इसलिए यहां प्रचारकों की संख्या भी अधिक है।
1942 में स्व.बाबासाहब भिडे महाराष्ट्र प्रान्त के प्रमुख प्रचारक थे। वे गृहस्थ थे, वकालत करते थे। उन्होंने महाराष्ट्र प्रान्त के प्रचारकों को "प्रान्त स्वयंसेवक' की
संज्ञा दी थी। प्रान्त स्वयंसेवक कहीं भी गया तो वह कोई गटनायक नहीं,शिक्षक नहीं, कार्यवाह अधिकारी
कुछ भी नहीं, वह तो सारे प्रान्त का है-इसलिए वह है प्रान्त स्वयंसेवक। उस समय स्व. बाबाराव ने किस तर्क का आधार लेकर यह संज्ञा निर्माण की थी, पता नहीं। पर प्रचारक संज्ञा का भावार्थ समझने के लिए मुझे यह संज्ञा अत्यंत सुयोग्य लगती है।
प्रचारक चाहे कश्मीर जाय या कन्याकुमारी, सोमनाथ जाए या जगनन्नाथ; जहां उसकी नियुक्ति की गई है ,
वही उसका गांव है, वहां के लोग उसके अपने लोग हैं। यहीं स्वयंसेवकत्व की सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता है।
यह प्राप्त करने,सीखने, अनुभव करने हेतू ही उसे प्रचारक बनना होता है। ऐसा स्वयंसेवक समाज के
हर क्षेत्र में पहुंचना, यह भारत के पुनरुस्थान का सूत्रपात है।
Santoshkumar B Pandey at 7.31pm

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