एक अनोखे रिश्ते की खोज

एक अनोखे रिश्ते की खोज

#पूज्य_माधव_राव_सदाशिव_गोलवलकर_जी
#दत्तोपंत_ठेंगडी_जी
#बाबू_जगजीवन_राम_जी

नागपुर संघचालक मा॰ बाबासाहेब घटाटे डॉ॰ मुंजेजी के कट्टर भक्त थे । बहुत दिनों से उनकी इच्छा थी कि कम से कम कुछ शहरों में #डॉ_मुंजे की प्रतिमा स्थापित हो। उन्होने आगे चलकर  डॉ॰ मुंजे स्मारक समिती की स्थापना की और #श्री_गुरुजी के सामने जिद पर अड़ गये के वे समिति की अध्यक्षता स्वीकार करें ।
ऐसे किसी समिति की अध्यक्षता स्वीकार करना श्री.गुरुजी के न तो स्वभाव मे था न ही उनकी योजना के अनुसार था ।परन्तु श्री बाबासाहेब इतना जिद पर अड़ गये कि आख़िर न चाहते हुए भी श्री.गुरुजी को उनकी जिद माननी पड़ी । इसके पीछे केवल यही कारण था कि श्री बाबासाहेब के #प_पूज्य_डॉ_हेडगेवार_जी से बहुत अच्छे सम्बन्ध और उनके द्वारा डॉ साहब कि आख़री समय मे की गई सेवा ।
इसके कुछ समय  पश्चात जब श्री.गुरुजी दिल्ली आये उनकी #जनसंघ के कुछ एम पी के साथ झंडेवालान मे चायपान का कार्यक्रम था ।उनसे बातचीत करते हुए श्री.गुरुजी ने उन्हे समिति की जानकारी देते हुए कहा कि वे #श्री_जगजीवनराम_जी से मिलें व उन्हे  समिति की पूरी जानकारी देते हुए उनसे आग्रहपूर्वक विनंती करें की वे समिति की सदस्यता स्वीकार करें और समिति की तरफ से मदद का जो निवेदन प्रकाशित करना है उसपर अपने हस्ताक्षर करें ।

यह सुनकर हमारे सभी एम पी मित्रों ने एक साथ आवेश में आकर कहा की वे आपकी विनती कहाँ मानने वाले हैं इस विषय पर तो उनसे बोलना ही व्यर्थ है ।यदि हमने कह भी दिया तो श्रीमती इन्दिरा गांधी के भय वे ना ही कहेंगे अतः उनसे इस संदर्भ में मिलना ही व्यर्थ है ।इसपर श्री.गुरुजी चुप रहे और उन्होने हाथ से मुझे रुकने का इशारा किया। सभी के जाने के पश्चात वे बोले ,”आप श्री जगजीवनरामजी  के यहाँ जाइये और इस विषय पर चर्चा कीजिये।

दूसरे दिन साड़े दस बजे सवेरे टॅक्सी लेकर मैं श्री जगजीवनरामजी के घर गया।हमारे व्यक्तिगत सम्बन्ध इतने अच्छे थे कि मैं एंगेजमेंट न लेते हुए भी उनके घर जा सकता था ।यदि वे काम कर रहे होते तो रुककर इंतज़ार करना स्वाभाविक सज्जनता का व्यवहार था अन्यथा मैं सीधा उनके  कमरे में उनसे मिलने जा सकता था । इसलिये मैं फोन न करते हुए सीधे उनके घर गया ।
उस समय पोर्च में उनकी गाड़ी खड़ी थी और वे जाने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे । मुझे देखकर बोले ,’अरे आप अभी आये हैं ?मैं तो दफ्तर जाने के लिये निकाला था ,कुछ अर्जण्ट काम था ।अब क्या किया जाय ?” मैं कोई जबाब नहीं दे पाया फिर वे ही पुनः बोले ,”आपका विषय लंबा हो शाम को आइये परन्तु यदि छोटा ही हो तो मेरे साथ ही गाड़ी में बैठिए वहाँ पहुँचने तक अपनी बात हो जायेगी ।“
मैं उनके साथ गाड़ी में बैठा और ओपोलोजिटिकली अपना विषय उनके सामने रखना शुरू किया ,डॉ॰मुंजे स्मारक समिती ,श्री.गुरुजी अध्यक्ष फिर भी संघ से कोई संगठनात्मक सम्बन्ध नहीं इत्यादि ।मुझे बीच मे ही टोकते हुए वे बोले ,”अरे भाई इतनी लम्बी कहानी सुनने की कोई जरूरत नहीं ,आप क्या चाहते हैं सीधे बताओ ।“ मैंने समिती की विनंती से उन्हे अवगत कराया।तो वे बोले ,”मुझे एक ही बात बताओ क्या आप  श्री.गुरुजी का यह संदेश लेकर मेरे पास आये हैं? आप जो कह रहें हैं वह आपके मन की बात है या  श्री.गुरुजी का संदेश है ।“मैंने कहा,”यह #श्री_गुरुजी_की_इच्छा है ।“तो वे बोले ,”उनकी इच्छा है तो मैं वैसे ही करूंगा ,मेरे पास समिती की सदस्यता का फ़ॉर्म और सहायता की अपील दोनों भेज दीजिये । मैं हस्ताक्षर कर वापस भेज दूंगा । “
हमारा यह संभाषण श्री.गुरुजी को बताया । उन्होने तुरंत श्री बाबासाहेब को फोन लगाया । दो ही दिनों में उनकी तरफ से सदस्यता फ़ॉर्म और निवेदन की प्रति सीधे ही श्री जगजीवनरामजी को पहुँचा दी गई ।उन्होने भी शीघ्र ही दोनों दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करके श्री बाबासाहेब को सीधे ही भेज दिये  । मैंने दोनों दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर हो जाने की सूचना श्री.गुरुजी को दिल्ली में दी ।
मिलने पर श्री.गुरुजीने मुझे चेताया कि,”इस घटना की जानकारी आपने एम पी मित्रों को मत दीजिये ।वे इसपर विश्वास नहीं करेंगे ।परन्तु निवेदन तुरंत छापने भेजा है । छपकर आने के बाद प्रति आप अपने एम पी मित्रों को दे दीजिये।“

उनके कहे अनुसार निवेदन छप के आया उसमे समिती के अध्यक्ष के रूप में श्री मा॰स॰गोलवलकर नाम था व नीचे सदस्य के रूप में हस्ताक्षर करने वालों में श्री जगजीवनरामजी का नाम था । यह मैंने अपने एम पी मित्रों को दिखाया तो उन्हे बहुत आश्चर्य हुआ ।
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Santoshkumar B Pandey at 11.48am

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