रक्षाबंधन उत्सव ये समरसता और संकल्प का उत्सव है !

नमस्कार,
  सभी स्वयंसेवकों को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं। 
रक्षाबंधन उत्सव ये समरसता का उत्सव है। हम सभी एक ही समाज के अंग है, हम सभी एक दूजे का हाथ पकड़कर आगे चलने के लिए कटिबद्ध है। 
रक्षाबंधन उत्सव ये संकल्प है के हम अपने धर्म, राष्ट्र की रक्षा करने के लिए कटिबद्ध है और सभी समाज बंधुओ को आत्मीय भाव से एक दूजे के लिए अडिग स्तंभ के समान खड़ा रहेने का संदेश देता है।
आज के परिस्थिति ने समाज के भिन्न भिन्न अंगो ने जो आगे आकर कार्य किया है ये हमारे रक्षाबंधन के अटूट बंधन का साक्षी है। इसी भाव से ओतप्रोत हम देश के प्रति अपनी निष्ठा समर्पित करते रहेंगे। 

आपको और आपके परिवार को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं🙏🚩🚩🚩🚩

आपका,
नगर सेवा प्रमुख 
( संतोषकुमार. बी. पांडेय )



रक्षा बंधन सन्देश :
"इस भूमि में अति प्राचीन काल से सम्पूर्ण समाज को विराट पुरुष के रूप में हमारे सामने रखा गया . प्रत्येक व्यक्ति उस विराट शरीर का एक छोटा सा अंश है . मनुष्य का शरीर छोटी छोटी अगणित जीवपेशियों से बना है. उन अवयवों को एक सूत्र में परिचालित करने वाली एक चैतन्यशक्ति शरीर की अस्मिता है. उसी के कारण सारे अवयव संपूर्ण शरीर की भलाई की दृष्टी से कार्य करते हैं. इसी के कारण शरीर सुदृढ़ सुव्यवस्थित एवं जीवमान दिखाई देता है. समाज रुपी शरीर की अवस्था भी उसी प्रकार है. समाज का प्रत्येक व्यक्ति उन जीवपेशियों और अवयवों के समान संपूर्ण समाज शरीर का अविच्छिन्न अविभाज्य अंग स्वरुप रहकर समाज- शरीर की सेवा के लिए सर्वस्वार्पण की भावना से युक्त होकर प्रयत्नशील रहे , तभी समाज उत्कृष्ट रूप से चल सकता है.

रक्षा बंधन के पवित्र पर्व पर यही बात ध्यान में रखकर मन में निश्चय करें की स्नेह की सच्ची अनुभूति लेकर कंधे से कंधे मिलाकर अपने में वास्तविक बंधुता का भाव उत्पन्न कर शुद्ध, पवित्र, एकात्म जीवन उत्पन्न करेंगे ." 
- श्री गुरूजी गोलवलकर


🙏 🕉️संस्कृतदिनः     🚩💓💐🙏

अद्य श्रावणमासः,शुक्लपक्षः,पूर्णिमा ( रक्षाबंधनम् ) 

संस्कृतदिनः अपि  अस्ति  ।

अस्मिन् संस्कृतदिनोत्सवे एवं रक्षाबंधनोत्सवे  सवाॅन् शुभकामनाः एवं शुभेच्छाः ।

जयतु संस्कृतम्  । वदतु संस्कृतम्  । जयतु भारतम्  ।

भद्रं भूयात्   । 🕉️🚩💐🙏



रक्षाबंधन उत्सव का महत्व संघ में :

 संघ ने इस उत्सव को विशेष रुप से चुना है और उसमे कुछ छोटे से परिवर्तन करके उसको सांस्कृतिक  उत्सव से उठाकर राष्ट्रीय उत्सव भी बना दिया है संघ शाखा पर या सार्वजनिक रूप से जब भी संघ का यह उत्सव मनाया जाता है तो पहली राखी हम अपने राष्ट्र के प्रतीक भगवा ध्वज को बाँधते हैं। और कामना करते हैं कि हमारा राष्ट्र शक्तिशाली हो क्योंकि शक्तिशाली राष्ट्र ही हम सब की रक्षा कर सकता है। फिर प्रत्येक स्वयंसेवक एक – एक  को राखी बनता है। जो इस बात का सूचक है कि हम सब एक हैं बंधु है। हमारा कर्तव्य है मिल जुलकर अपने राष्ट्र की रक्षा करना। इस छोटे से परिवर्तन ने इस उत्सव के सांस्कृतिक महत्व को  और बढ़ाते हुए इस को राष्ट्र निर्माण का उत्सव बना दिया है।

हमारे संविधान में स्वतंत्रता शासन समानता और बंधुत्व का इस की प्रस्तावना में भी उल्लेख हुआ है। यह शब्द फ्रांस की क्रांति से लिए गए भारतीय तत्वज्ञान इसके बिल्कुल विपरीत है। यह राज्यसत्ता को कभी  महत्व नहीं दिया गया। बंधे हाथों से जुड़ा हुआ समाज सबसे श्रेष्ठ माना गया। इसलिए विदेशी राज्य आए और वह गए संघर्ष चलता रहा और समाज से जीवित रहा।  हमारा स्वतंत्रता के बाद का इतिहास यह बताता है कि राज्य की शक्ति के द्वारा बंधुता नहीं पैदा की जा सकती है। अगर ऐसा होता तो आज भारत का चित्र दूसरा ही होता । राज्य बंधुता निर्माण करने में सहायक हो सकता है या उसको लाने में बदले  बाधाएं उपस्थित कर सकता  हे ? क्या बंधुता निर्माण करने को एक सिविल कोड बना ? क्या भारत में हिंदू – मुस्लिम  झगड़े समाप्त करने के लिए गौ हत्या पर देशव्यापी प्रतिबंध लगा ? क्या शिक्षा जो धार्मिक मदांध  व्यक्ति पैदा करती है उसके स्थान पर राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली सबके लिए एक सी निर्माण की ? मिजोरम में पाबंदी लगी हुई है कि वह ईसाई पादरी तो घुस सकते हैं पर मानव धर्म धर्म प्रचारक नहीं। जो वहां के प्राचीन धर्म के प्रति कौम  को जागृत करना चाहते हैं। क्या यह बंधुता के प्रचार में बाधा नहीं है। वास्तव में राज्य मिलना समानता ला सकता है और न बंधुता। क्या अच्छा होता कि यदि नकल उतार नीति तो बंधुता को प्रथम स्थान दिया जाता है।

 वास्तव में बंधुता  ही समानता की जड़ है। जब तक बंधुता ना हो जब तक सब लोग अपने परिवार का अंग ना समझे उस में समानता कैसे हो सकती है ? आर्थिक बात का इतना महत्व नहीं जितना भावात्मक बात का। और बंधुता और समांतर जब दोनों लोग हो जावे तो राष्ट्रीय स्वतंत्र कैसे रहेगा ? स्वतंत्रता कुछ लोगों के प्रयत्न से आएगी पर कभी भी जा सकती है। उसके अमृतमय फल चखने को नहीं मिल पाते। विभिन्न समस्याएं खड़ी होती रहती हैं और राज्य खुद दोषी न बन कर दूसरों को दोष देता रहता है।रक्षाबंधन का महत्व अद्भुत है !

 केरल प्रांत में इतनी भयानक छुआछूत की स्वतंत्रता के समय संविधान में छुआछूत समाप्त की गई। कांग्रेस व कम्युनिस्ट मंत्रिमंडल बने तथा अछूतों को कुछ सुविधाएं मिल गई और कुछ सीटें मिल गई कुछ आर्थिक लाभ हो गया पर क्या वह समाज में समानता के अधिकार समाप्त कर सके ? कुछ मंदिरों में दर्शन करने से क्या समस्याएं हल हो गई विदेशी धन उनको इसाई वह मुसलमान बनने को खींच रहा है। केरल में संघ कार्य बड़ा शाखाएं खुली यह रक्षाबंधन का उत्सव ग्राम ग्राम नगर नगर मनाया जाने लगा उसने बंधुत्व की भावना पैदा कि सब एक परिवार के अंग बन गए और उनको यह समानता का अधिकार अनायास ही मिल गया। आज केरल प्रांत में पराया छुआछूत समाप्त हो गई है। जो कम्युनिस्ट थे आज वह संघ  शाखाओं में दिखाई देते हैं।

 आज हमारे राष्ट्र में ऐसे उत्सव को मनाने की नितांत आवश्यकता है। संग का लक्ष्य समाज के हर घटक  को उसने भावना के सूत्र में आबद्ध कर समस्त देश को सुगठित करना है। पिछले २५ ००० वर्ष का इतिहास भी हमको यही शिक्षा देता है कि बंधुता का आरोप होने के कारण राष्ट्र एक रुप होकर खड़ा ना हो सका। देश में शक्तिशाली शासन के वीर योद्धा थे शस्त्र थे जब राणा सांगा का बाबर से युद्ध हो रहा था उस समय दक्षिण में विजयनगर का हिंदू साम्राज्य अपने पूर्ण वैभव पर था। अगर वह राणा सांगा की मदद कर देता तो राणा सांगा तो बाबर को उठा कर दूसरे देश में फेंक आते। पानीपत के तीसरे युद्ध में भी यही हुआ जब मराठों की और अब्दाली और मुस्लिम शक्तियों के बीच निर्णायक युद्ध हो रहा था। तब हमारे राजपूताने के वीर खड़े हुए जब जब भी संगठित होकर खड़े हुए तो हमने उन आक्रमणकारियों की सत्ता को समाप्त कर दिया।

 हमने अपने ही समाज में के एक अंग से बंधुता और समानता का भाव रखना छोड़ दिया ऐसा होने पर ही धन का कुचक्र चले जाता है आज देश में भाषावाद प्रांतवाद उत्तर दक्षिण के विभिन्न था विरादरी क्यों भर रहे हैं?

इन सब का कारण बंधुता पर जोड़ना देना है आज जो समस्याएं देश को निगल जाने का को मुंह बनाए खड़ी है उनका एक ही उपचार है संगठन और संगठन बंधुता यानी पारिवारिक आधार पर संग इसी में लगा है।

यदि हम बंधुता पर जोर देने वाले कार्यक्रम लेकर देश के कोने-कोने में इस समाज को जगाए तो यह आवश्यक रूप होकर खड़ा हो सकेगी यही राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है इसमें हमारी संस्कृति कितनी सहायक हो सकती है यह रक्षाबंधन हमारा सांस्कृतिक उत्सव है। संस्कृति राष्ट्र की आत्मा होती है बंग भंग के समय कविवर रविंद्रनाथ ठाकुर ने 50000 लोगों के साथ गंगा में स्नान किया था और राखी बांधकर उसे अजय शक्ति को जगाया था जिसने ब्रिटिश शासन को हिला दिया और उन्हें बंग-भंग समाप्त करना पड़ा हमारा रक्षाबंधन का उत्सव इन्हीं बातों का संदेश देता है।रक्षाबंधन उत्सव का महत्व यही है!

इस भगवा प्लेटफार्म से हम हिंदू अथवा हिंदुस्तान के लोगों से एक सभ्य व शिक्षित समाज की कल्पना करते हैं। जिस प्रकार से राम – राज्य में शांति और सौहार्द का वातावरण था , वैसे ही राज्य की कल्पना हम इस समाज से करते हैं।
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SantoshKumar Bhagirathi Pandey 

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