Posts

शाखा में दंड प्रयोग & दंड युद्ध : दंड प्रहार से चित्त की एकाग्रता और बनी रहती है स्फूर्ति !

Image
महाराणा प्रताप की बाजुओं में इतना दम था कि उन्होंने तलवार के एक ही वार से बहलोल खान को जिरह-बख्तर, घोड़े सहित काट डाला। रानी दुर्गावती युद्ध के मैदान में घोड़े की लगाम मुँह में थाम कर दोनों हाथों में तलवार लेकर उतरी थीं और शत्रुओं  को नाकों चने चबवा दिए। छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपनी तलवार के बल पर आदिलशाही और मुगलशाही से टक्कर लेते हुए हिन्दू साम्राज्य की स्थापना की थी। हम उन्हीं महान पूर्वजों के वंशज हैं। हमारी भुजाओं में वैसा ही बल चिर स्थाई रहे, हम क्षमतावान बने रहें, इसके लिए संघ ने कुछ वर्षों से अनूठा प्रयत्न प्रारंभ किया है:- प्रहार महायज्ञ 16.12.1971 को भारत की पराक्रमी सेना ने पाकिस्तान की सेना के 97,368 सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया था। इतिहास का यह एक बिरला ही उदाहरण है। इस गौरवशाली दिवस पर  स्वयंसेवकों के बल और सामर्थ्य में वृद्धि तथा उनमें विजिगीषु वृत्ति उत्पन्न करने के उद्देश्य से संघ प्रतिवर्ष 16 दिसम्बर को  प्रहार महायज्ञ का आयोजन करता है। आइए उस दिन अपनी शाखा पर दंड लेकर अधिकतम प्रहार लगाएँ और इस महायज्ञ में अपनी आहु...

Sangh RSS Ghosh ( RSS Musical Band ) Vandana 🚩🕉️🎺🎷📯🥁🎼🎶💟🙏

Image
 Param Punjya Shri Dr. Mohan Bhagwatji, Sarsanghchalak of Rashtriya Swayamsevak Sangh, said that Bharatiya music draws the world towards truth, compassion and divinity. The world over, music is viewed as a source of entertainment, whereas in our country, the established tradition is that music is understood as a means to truth, compassion and divinity.  It was because of the special quality of our music, that it was included as an integral part in the methods and activities of the Sangh, from the early years of the formation of the Sangh. Collective listening and performance of music creates Sanskaras. The cultivation of a shared musical note produces a collective Sanskara and harmony in the society. Through music sangh aims to unite the entire society. This is our integral duty, not just a favour that we are doing from a superficially cultivated benevolence. The instrumentalist receives no compensation for his efforts. These swayamsevaks come from diverse age grou...

#_गृहस्थ_प्रचारक_भैया_जी_दाणी_#

Image
#_गृहस्थ_प्रचारक_भैया_जी_दाणी_ # आज आपका अवतरण दिवस हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परम्परा में प्रचारक अविवाहित रहकर काम करते हैं; पर कुछ अपवाद भी होते हैं। ऐसे गृहस्थ प्रचारकों की परम्परा के जनक प्रभाकर बलवन्त दाणी का जन्म 9 अक्तूबर, 1907 को उमरेड, नागपुर में हुआ था। आगे चलकर ये भैया जी दाणी के नाम से प्रसिद्ध हुए। ये अत्यन्त सम्पन्न पिता के इकलौते पुत्र थे। उनके पिता श्री बापू जी लोकमान्य तिलक के भक्त थे। अतः घर से ही देशप्रेम के बीज उनके मन में पड़ गये थे, जो आगे चलकर डा. हेडगेवार के सम्पर्क में आकर पल्लवित पुष्पित हुए।  भैया जी ने मैट्रिक तक पढ़ाई नागपुर में की। इसके बाद डा0 हेडगेवार ने उन्हें पढ़ने के लिए काशी भिजवा दिया। वहाँ उन्होंने शाखा की स्थापना की। नागपुर के बाहर किसी अन्य प्रान्त में खुलने वाली यह पहली शाखा थी। इसी शाखा में काशी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरुजी) भी आये, जो डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद सरसंघचालक बने।  काशी से लौटकर भैया जी ने नागपुर में वकालत की पढ़ाई की; पर संघ कार्य तथा घरेलू खेतीबाड़ी की देख...

" राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ "

Image
संघ ( राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ) :- 1. यह सुनिश्चित है कि किसी भी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थिति में साहस के साथ अपना मार्ग निकालते हुए, सब प्रकार के संकटों को कुचलते हुए तथा उनकी परवाह न करते हुए, संघ अपने विशिष्ट मार्ग से निरन्तर प्रगतिपथ पर अग्रेसर रहेगा। हम पर जितने आघात होंगे उतनी ही अधिक शक्ति से रबर की गेंद के समान उछल कर ऊपर ही उठेंगे। हमारी शक्ति अबाधित रूप से बढ़ती ही जायेगी और एक दिन वह सारे राष्ट्र में व्याप्त हो जायेगी। 2. स्वराज्य-प्राप्ति एक घटना है, क्रिया है। स्वतंत्र समाज-जीवन सुरक्षित और संपन्न रखना चिरंतन महत्व का प्रश्न है। उसके लिये राष्ट्र सदैव सिध्द रहना चाहिए। वह सिध्दता रहने के लिये राष्ट्र-जीवन में से हानिकारक अवगुण मिटाकर सुसूत्र, सामर्थ्यशाली समाज-जीवन निर्माण करने की दृष्टि से अपना कार्य खड़ा किया गया है। हिंदू-राष्ट्र-जीवन की कल्पना निर्भयपूर्वक सामने रखकर उसकी गौरववृध्दि के लिये सारा समाज एकसूत्र में संगठित करने का कार्य अपने सामने है। इसलिये संघ के नाम सहित प्रत्येक बात का सूक्ष्मता से विचार कर कार्य की रचना की गई है। 3. समष्टि-जीवन की भावन...

शाखा मुख्यशिक्षक : व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण !

Image
शाखा   मुख्यशिक्षक   यह शब्द संघ के स्वयं सेवकों को एकदम से समझ में आयेगा। मेरे जीवन में जितने भी दायित्व रहे उसमें सबसे अच्छा दायित्व मुख्य शिक्षक का ही है । पहले गटनायक बनाया फिर गणशिक्षक फिर नयी जगह शाखा लगाना और पहले बिना ध्वज की शाखा लगाना फिर शाखा को ध्वज मिले इसके लिये लोगो को प्रार्थना याद कराना,गणवेष बनवाना,तीन गण तक बने यह चिंता करना। सच में शाखा का मुख्य शिक्षक बनना मतलब एक साम्राज्य खड़ा करने जैसा । यही संघ हैं जो अपने स्वयंसेवकों को एक साम्राज्य खड़ा करने का अवसर देता हैं।   *स्वयंसेवक* स्वयंसेवक होने से बढ़कर गर्व और सम्मान की दूसरी बात हमारे लिए  कोई   नहीं है। जब हम कहते हैं कि मैं एक साधारण स्वयंसेवक हूँ, तब इस दायित्व का बोध हमें अपने हदय में रखना चाहिए कि यह दायित्व बहुत बड़ा है। समाज भी हमारी ओर देख रहा है और समाज हमें एक स्वयंसेवक के रूप में देखता है। समाज की हमसे बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ रहें और उन अपेक्षाओं को पूर्ण करते हुए हम उनसे भी अधिक अच्छे प्रमाणित हों। शाखा के विषय में नित्य करणीय बातें संघ-शाखा के विषय में ध्यान रखें कि हमारी शा...

बढ़ रहे हैं हम निरन्तर !

Image
संघ  कभी ना हारने वाला,        कभी ना थकने वाला,             कभी ना झुकने वाला ,          भगवान श्रीकृष्ण के रथ के समान -  विजयी रथी हैं.                       जो संगठन, समरता,  सम्पर्क,  समर्पण,  साहस और  सामर्थ्य के साथ आगे बढ़ता हैं  !!    -  विजय ही विजय  - 🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋🌋 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 जय श्री राम 🌹🕉🚩🙏 ' भारत माता की जय 🇮🇳⛳💞🙏 संतोष कुमार  बी   पाण्डेय . 

🙏💞💐 समष्टिमय जीवन - पं. दीनदयाल उपाध्याय 🌷💞🙏

Image
समष्टिमय जीवन - पं. दीनदयाल   उपाध्याय  लेखक स्वयंसेवक संतोषकुमार बी  पाण्डेय एक सज्जन ने, जो अपने-आपको संघ के विरोधी समझते हैं, कहा : ''राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक के नाते नहीं, बल्कि श्री माधवराव गोलवलकर के नाते श्री गुरुजी के व्यक्तित्व में मेरी श्रध्दा है।'' उनका कथन कोई अनूठा नहीं, क्योंकि इस प्रकार का विचार करने वाले बहुत से हैं। एक समय वह भी था (सन् १९४८ में) जब बड़ों-बड़ों ने यह कहा कि 'संघ और संघ के स्वयंसेवक तो अच्छे है, किन्तु उनके नेता और संचालक उन्हें गलत दिशा की ओर ले जा रहे हैं।' अर्थात् दोनों प्रकार के व्यक्तियों की भावनाओं में अंतर हो सकता है, किन्तु विचारों की भूमिका में नहीं। उनके अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक और श्री माधवराव गोलवलकर दो व्यक्ति हैं। मेरे अनुसार वे दोनों को ही नहीं समझ पाए, न तो संघ को और न श्री गुरुजी को। महानता का रहस्य मैं जब यह कहता हूँ कि श्री गुरुजी का व्यक्तित्व संघ के सरसंघचालक से पृथक् कुछ भी नहीं, तो मेरा यह अर्थ नहीं कि उनमें महान् विभूतिमत्व का अभाव है। संघ के सरसंघचालक बनने पर उन्हों...